Imprinted
January 18, 2012
अतिक्षय
हैं धुआं सा
छाया अँधेरा
रात का मुख्मौन डेरा
निशब्द साँसे
दबी हुई सी
सिस्कियों का
शोर घेहरा
कंकाल से सब
बुत खड़े हैं
मृत्यु का जंजाल फैला
रूह रूठी हैं बदन से
अक्स का हैं साथ छूटा
कुम्हली हुई सी जिंदगी हैं
अतिक्षय का यह खेल घिनोना ।
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